Monday, 13 January 2014

बदले आखिर गाँव हमारे !


पिछले दिनों लगभग 8 वर्ष बाद अपने पैतृक गाँव जाना हुआ । वहां हुए परिवर्तन व विकास (अथवा ह्रास) ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया । अब ये वो पुराने गाँव नहीं रहे , बदल गए हैं ।

नहीं झोपड़ी नहीं तबेला,
न कोई बच्चा गन्दा मैला ।
नहीं बाग़ नहीं वो अमराई ,
न ही बैल न ही गाय पछायीं ।
नहीं ताश नहीं वो ठलुआई ,
नहीं हँसी ठट्ठा वो भाई ।
ना वो कच्चे आँगन द्वारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।




ना वो लाल रिबन की चोटी ,
भारी कुनबा साझी रोटी ।
न अब कहीं पंचायत होती ,
ना आँगन में कुतिया सोती
ताऊ नहीं दातौन चबाते ,
ना चाचाजी डंड लगाते ।
सब रोजी रोटी के मारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।



चूल्हे देते नहीं दिखाई ,
कहाँ दही,कहाँ दूध मलाई !
सभापति का घोड़ा छूटा ,
सैंट्रो पर मन उनका टूटा ।
ना ठाकुर ताजिया उठाते ,
ना हाजी रामायन गाते ।
साबिर - विक्रम हुए न्यारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।

Letter to Arvind Kejriwal - Kamal Farooqui Is An Honest Test Of The Road You Will Take To Bring About The Change

Dear Arvind ,
Ex-Samajwadi Party leader Farooqui meets Arvind Kejriwal, says 'everybody is interested in joining AAP'
Read more at: http://indiatoday.intoday.in/story/kamal-farooqui-samajwadi-party-join-aap-arvind-kejriwal-sanjay-singh/1/333479.html
This news extensively shocks me and other many admirers of AAP. Yes I know you ve not given green signal to him yet. Yes I know that and believe that you are a bunch of intelligent and perspicacious people. Yes I know that we should not doubt your intention. Most Importantly I know that  if I can discriminate between right and wrong , you must have planned far brilliant things. Therefore , this news should not be shocking for me, for I must know that you would think 1000 times before taking any such decision.
But it shocks me. Farooqui’s meeting with you does not shock me, media’s speculations don’t shock me (I never cared about their exit polls even) , neither do the statements  of other parties on this meeting. What shocks me is , the statement of Farooqui post meeting.
 On being asked whether he was going to join AAP, Farooqui said that he "would let you know (reporters) tomorrow".
Read it carefully Arvind. What does it mean ? What message does it convey ? What does it hint to your admirers , people who took interest in politics for the first time in their entire lives? Let me tell you what do I understand by this statement (quite possible Farooqui’s intent was just to convey this false message to people like me in order to break our trust in you). This statement makes one understand that You have offered Farooqui to join AAP and he demanded one day time to think over it. Isn’t it ridiculous ? I believe that you ve not made any such offer. I trust in you and your intellect and your principles .
All I mean to say that you must not take this man just because he’ll bring in some Muslim votes. Its irony of our country that instead of working for Muslims , our leaders use them. Be it Congress, SP or BJP. Everyone has same theory . Add a big leader with you and a huge community of minority would cast their vote in your name. Please do not fall in the same line Arvind , I believe you shall not. This man doesn’t deserve to stand with you. Sins he has done are too abhorrent to forgive.[to name one - Farooqui, who was sacked by SP as its secretary in September following his controversial comment that Indian Mujahideen co-founder Yasin Bhatkal was arrested because of being a Muslim, said here that he would announce his decision on joining AAP on Monday.]
 Also , AAP is not holy Gangey where even the most nefarious souls can get rid of their sins and get Moksha .
You are wise enough to understand feelings of your admirers. We are the people who never bothered about the elections and politics. We are the one who used to eat drink and be merry in our lives until you made us realize our power as well as our responsibilities.

DON'T DISAPPOINT US , DON'T DISAPPOINT THE NATION !!!
Jai Hind
Sincerely,
An Aam Aadmi

Taught moral and real moral

Once there was a dog sitting in a corner of forest and biting a bone when he noticed a tiger was just behind him. He got scared but then he thought to give his brain a chance. He said loudly to himself - "this tiger was really tasty I just finished. I wonder if I get another one for lunch" Tiger got scared and ran away. He met a monkey on the way who started laughing like hell when tiger told him whole story. Then our Tiger decided to teach that nasty dog a lesson for the life. He returned to dog with the monkey on his back. This over smart dog was still having fun with that piece of bone and it was too late to run till he realized he was in deep shit. But still he didn't give up and gave a shot , said to monkey - "you son of a bitch ! I asked you to bring two tigers for my meals and you are coming with one ? you are fired !!! " Tiger was so terrified that he dropped the monkey off his back and eloped like a rocket. 

TAUGHT MORAL : If you are as wise as dog , you can tackle any problem in life.

ACTUAL MORAL : If you are as dumb as tiger , this world can be-fool you numerous times in a row !!!

रबड़ के उसूल

मुझे राजा दशरथ की कहानी याद है. उसने कैकेयी को वचन दिए थे . " प्राण जाये पर वचन न जाये " उसका उसूल था. वही उसने किया . जान दे दी पर उसूल से न हटा. मजबूत उसूलों की यही कमी है, ये हमेशा खुद का नुकसान कराते हैं. दशरथ से लेकर मुंशी प्रेमचंद जैसे उसूलवादियों से मैं वाकिफ हूँ , सबको उनके उसूलों ने धोबी पछाड़ मारा है. मुझे लगता है कि पुराने समय में उसूल बहुत मजबूत मटेरिअल के बनाए जाते थे. आदमी टूट जाता था पर क्या मजाल कि उसूल टूट जाए. एक उसूल पर पीढियां निकल जातीं थीं.
                                         अब ज़माना बदला है. एक उसूल से पीढ़ी तो क्या एक आदमी का काम चलना भी मुश्किल है. बीते दिनों अन्ना के आन्दोलन से प्रभावित होकर हमने उसूल बनाया था - " रिश्वत नहीं देंगे , किसी कीमत पर नहीं " . पालन भी किया. ट्रैफिक पुलिस वाले को 100/- की रिश्वत न देकर 600/- का चालान मैंने भरा है. पर कब तक ? मजबूत उसूलों की यही कमी है, ये हमेशा खुद का नुकसान कराते हैं. पिछले महीने का बिजली का बिल आया है. 5000/- रुपए ! मैं हैरान हूँ . बिजली से चलने वाले जितने संसाधन मेरे घर में हैं , उन्हें 24*7 चलाने पर भी इसका तिहाई बिल आना असंभव है. भूलसुधार की अपील करने पर कहा गया - " साहब यह प्रिंटिंग मिस्टेक है. इतनी आसानी से ठीक नहीं होगी. हमारे नेता भी अपने भाषण की प्रिंटिंग मिस्टेक अपने आप ठीक नहीं करते और कुछ का कुछ बोल जाते हैं. शायद आपने 3 idiots फिल्म नहीं देखी , प्रिंटिंग मिस्टेक 'चमत्कार' को 'बलात्कार' में बदल सकती है." मैंने झल्लाकर हल पूछा तो बताया गया - " आप अभी बिल भर दीजिये , साथ ही इन्वेस्टिगेशन की अर्जी लगा दीजिये. पॉजिटिव होने के केस में amount वापस मिल जायेगा." मैं इन्वेस्टिगेशन से बहुत डरता हूँ. बोफोर्स से लेकर आरुषि तक का इन्वेस्टिगेशन पेंडिंग है. कहीं ऐसा न हो के इन्वेस्टिगेशन पूरा होते होते मेरा परपोता अधेड़ हो चुका हो. तब की मंहगाई में वो 5000  में अपने पोते के लिए कैंडी भी नहीं खरीद पायेगा. मेरा सर घूम गया और मैंने उसूल को भी थोडा सा घुमा दिया. 200 रूपए बड़े बाबू के हाथ पर रखे और 500 रूपए का बिल भरकर पक्की रसीद ले ली. अब मैं बड़े बाबू की चाय पानी का ध्यान रखता हूँ. नहीं तो साला प्रिंटिंग मिस्टेक करवा देगा. अब मेरा उसूल है - " जब तक नुकसान अफोर्डेबल है, रिश्वत नहीं देंगे". कौन जाने कल हो जाये - "जब तक कायदे का फायदा न मिले, रिश्वत नहीं देंगे." उसूल में मैंने एक adjustable space बना लिया है. बखत जरुरत के हिसाब से मैं वहां कुछ भी घुसा देता हूँ. यों मुख्य भाग ज्यों का त्यों है - "रिश्वत नहीं देंगे".



                         यहाँ तक फिर भी ठीक है. कई बड़े लोग उसूल का मटेरिअल ही बदल देते हैं जिससे उसका कायाकल्प किया जा सके. वर्माजी हैं. बहुत अच्छे आदमी. बहुत अच्छा उसूल ( जो गाली गलौच ज्यादा लगता है.) - " सारे नेता चोर हैं. सारे भ्रष्टाचारी. हम तो कुत्ते का भरोसा कर लेंगे पर नेता का नहीं." (यों कुत्ता नेता से ज्यादा भरोसेमंद है ये सब जानते हैं.)  पर पिछले महीने एक मंत्रीपुत्र (और संभवतः भावी मंत्री) से वर्मा जी  की बेटी की शादी हो गयी. अब उन्होंने पुराना उसूल त्यागकर नया उसूल धारण किया जैसे आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है - "कुछ ईमानदार और कर्मठ नेता भी हैं (उनके समधी साहब) पर लोग उनपर विश्वास नहीं करते." मैंने बहुत जोड़ - घटा किया, किसी तरेह का adjustment  नहीं है यहाँ वरन उसूल का संपूर्ण कायापलट हो गया है. ऐसा तभी संभव है जब उसूल किसी बहुत ही लचीले पदार्थ का बना हो जैसे - प्लास्टिक,रबड़ , मोम , गीली मिटटी, कीचड़ , कचरा , मैला आदि आदि ....................
                                शीशे के उसूल और भी बेहतर. यहाँ उसूल की शेप चेंज नहीं करनी होती. ये सस्ते, सुन्दर और use and throw होते हैं , पर टिकाऊ होना संदिग्ध है. पैसे वाले पॉवरफुल लोग ऐसे उसूल रखते हैं. यहाँ यह बात काबिलेगौर है की नया उसूल अपनाते ही पुराना वाला तोड़ के फेंक देना ज़रूरी है. use and throw उसूल , चमचमाते उसूल, सस्ते उसूल, शीशे के उसूल ! वाह !
                                रबड़ के उसूल तो अति उत्तम. न हर बार नया उसूल लेने का झंझट, न उसूल बदलने में कोई मेहनत. super flexible quality , durability की guarantee. हमारे लीडर्स ऐसे ही उसूल रखते हैं. तभी तो देश के कर्णधार हैं. दो राजनीतिक पार्टियाँ हैं. यहाँ सुभीते के लिए एक को 'चोर' पार्टी कहेंगे और एक को 'लुटेरा' पार्टी. अभी लुटेरे सत्तारूढ़ हैं. चोर उन्हें गरियाते हैं. दोनों ही दल सुपर फ्लेक्सिबल रबड़ के उसूलों से सुसज्जित हैं. अपनी रैलियों में चोर पार्टी के नेता चिल्लाते हैं - "ये लुटेरा सरकार घोटालों की सरकार है. ये सब भारत माता के व्यापारी हैं. इनकी गलत नीतियों के चलते देश बर्बाद हुआ जाता है. अगर सुख, समृद्धि और खुशहाली चाहते हैं तो आगामी चुनाव में 'चोर' पार्टी को भारी मतों से विजयी बनायें और मंहगाई और भ्रष्टाचार पर काबू पायें."
                                'लुटेरा' पार्टी प्रतिवाद करती है - "अगर यही लोग देश के हितचिन्तक होते तो चुनाव क्यों हारते ? हारे इसलिए क्योंकि विकास और 'आम आदमी' की समस्याओं पर ध्यान न देकर उन्होंने 'अमरीकापरस्ती' पर ज्यादा ध्यान दिया. सारा विदेशी मुद्रा कोष इन्होंने 'सब्सिडी' दे-देकर खाली कर डाला है. अब इतनी बिगड़ी स्थितियों से निबटने के लिए 5  साल का वक़्त नाकाफी है. देश चमकेगा , पर उसे चमकाने के लिए हमें कम से कम 25  साल का वक़्त तो दीजिये. चिंता न कीजिए , हम साल में केवल 30 बार पेट्रोल के दाम बढ़ाएंगे"
                           पूरे पांच साल दोनों पार्टियों के सभी धुरंधर गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते हैं. अपने विरोधिओं को सभी प्रचलित और नवनिर्मित अपशब्दों से विभूषित करते हैं (जी हाँ , गालियाँ राजनीति का आभूषण हैं.). पांच साल बाद दोबारा चुनाव होते हैं.
                         इस बार विचित्र स्थिति है. 'चोर' और 'लुटेरा' दोनों ही पार्टियों के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं हैं. यही समय उसूल परिवर्तन के लिए उपयुक्त है , नेता इसे 'हृदय परिवर्तन' कहते है. वे उम्दा किस्म के हार्ट स्पेशलिस्ट हैं. बिना सर्जरी के ही इंसान के अन्दर कुत्ता, गधा, गीदड़ , भेड़िया, सूअर आदि जिसका मर्जी हृदय 'फिट' कर सकते हैं. मैंने ऐसे-ऐसे नेताओं को देखा है जिनके अन्दर ये सारे दिल एक साथ मौजूद रहते हैं, उपयोगिता के हिसाब से वो जो मर्जी हो उसको 'एक्टिवेट' कर लेते हैं और  बाकी को ऑफ मोड पर रखते हैं. ये उत्तम किस्म की टेक्नोलोजी है. पर इसकी इफेक्टिव प्रोसेसिंग के लिए इंसान का दिल निकाल फेंकना पहले जरूरी है. देशहित में हमारे ये महान नेता ये काम पहले ही कर चुके हैं.
                             बात चुनाव के नतीजों की हो रही थी. नतीजे कुछ इस तरह हैं की एकमत से सरकार बनना नामुमकिन है. अब दोनों राष्ट्रप्रेमी पार्टियाँ देशहित में अपने रबड़ के उसूलों को तोड़ मरोड़कर एक नए निष्कर्ष पर पहुँचते हैं - 'संयुक्त सरकार' !!!  छः महीने अमरीकापरस्त विकास के दुश्मन 'चोर' कुर्सी सम्हालें और छः महीने भ्रष्टाचारी, माँ के व्यापारी 'लुटेरे' गद्दीनशीन हों. फिर छः महीने चोर, फिर छः महीने लुटेरे................. इस तरह पूरे पांच साल तक ये दोनों देश को बिरयानी समझकर लोकतंत्र के अचार के साथ आराम से खाते रहेंगे. पांच साल तक दोनों का मन एक दूसरे से मिला रहेगा. यही भारत की महान संस्कृति है, धर्मग्रंथों में भी लिखा है - "सारा जाता देखकर आधा लीजे बाँट." भारतीय दर्शन को हमारी दोनों सुसंस्कृत पार्टियों ने आत्मसात कर लिया है. पांच साल बाद अचानक दोनों के उसूल फिर अलग अलग हो जायेंगे और दोबारा एक दुसरे पर गालियों और जूतों की बौछार शुरू हो जायेगी. कैसी सुन्दर व्यवस्था है ! ऐसा निस्वार्थ और निष्काम कर्मयोग तो गीता में भी दुर्लभ है.
                       दशरथ की कहानी सुनने , समझने और मानने वाले हैरान हैं. वो आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं. यह क्या हुआ ?
                       अरे मूर्खों ! तुम ऐसे ही आँखें फाड़ते-फाड़ते मर जाओगे. तुम गरीबी और भुखमरी के मारे हो , ऐसे उच्च विचारों को समझना तुम्हारी सामर्थ्य के बाहर है. तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं और तुम उसूल भी लोहे पत्थर के बनाते हो. तुम्हारी क्या औकात कि तुम रबड़ कि importance समझो ! काश तुम इन रबड़ के मुखौटों को समझते तो तुम्हारी ये हालत न होती. तब तुम अपनी ताकत और उसका इस्तेमाल करना भी जानते. काश तुम्हें भेड़ की खाल में भेड़िये की पहचान होती. तुमने अपनी सारी जिंदगी ईंट पत्थर के उसूलों को चमकाने में निकाल दी और पीढ़ियो से सड़ते आ रहे हो और न जाने कब तक सड़ोगे ? तुम्ही में से कुछ ने टाइम के साथ - साथ अपने उसूलों का मटेरिअल बदला और नतीजा तुम्हारे सामने है. अब जाओ और अपनी बदहाली पर सर पीटो. तुम इसी लायक हो की चोर और लुटेरे एक साथ तुम्हारा बलात्कार करें. मैं तुम्हारी तरह लकीर का फ़कीर नहीं हूँ. मैं 'लोकतंत्र जिंदाबाद' भी लिख देता हूँ और जरुरत पड़ने पर लोकतंत्र की बुराई में भी निबंध लिख सकता हूँ. मैं शराब की खामियों पर भी भाषण दे सकता हूँ और उसकी खूबियों पर भी समां बांध सकता हूँ . तुम रोते रहो मैं चलता हूँ, मुझे 'चोर' पार्टी के प्रमुख की शपथग्रहण के बाद का भाषण लिखने का कांट्रेक्ट मिल चुका है , बहुत काम है.

Stupid fable : The tyrant and the truth


Once the Lion , leader of beasts had a fight with an elephant and utimately killed him. The Elephant was also a mighty creature and he left the king in immense combat injuries. After the war was over, the ministers surrounded him.

“My lord , you are unequivocally the most powerful among all creatures in the universe. That rook was almost 100 times of your size , but you put him down in just one attempt. We are lucky to have a captain like you.” said the fox.
“We feel safe under your kingdom. You are our saviour” the hyena uttered.
Similary all the animals expressed their gratefulness except the rabbit who was sitting quiet.

When lion asked for his opinion he said carefully “I think its your persecution on herbivorous animals which made the elephant rebel. You and your commanders kill any deer or bull or lamb whenever they feel like. I think you should make strict rules in this concern to avoid further outbreaks”
Lion was stunned. He was not so wise to take this feedback positively. He was, being a King, acquainted of praise and blandishment. He mangled the rabit with a mighty punch.

Moral : A tyrant seldom assents the truth.