Monday, 13 January 2014

बदले आखिर गाँव हमारे !


पिछले दिनों लगभग 8 वर्ष बाद अपने पैतृक गाँव जाना हुआ । वहां हुए परिवर्तन व विकास (अथवा ह्रास) ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया । अब ये वो पुराने गाँव नहीं रहे , बदल गए हैं ।

नहीं झोपड़ी नहीं तबेला,
न कोई बच्चा गन्दा मैला ।
नहीं बाग़ नहीं वो अमराई ,
न ही बैल न ही गाय पछायीं ।
नहीं ताश नहीं वो ठलुआई ,
नहीं हँसी ठट्ठा वो भाई ।
ना वो कच्चे आँगन द्वारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।




ना वो लाल रिबन की चोटी ,
भारी कुनबा साझी रोटी ।
न अब कहीं पंचायत होती ,
ना आँगन में कुतिया सोती
ताऊ नहीं दातौन चबाते ,
ना चाचाजी डंड लगाते ।
सब रोजी रोटी के मारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।



चूल्हे देते नहीं दिखाई ,
कहाँ दही,कहाँ दूध मलाई !
सभापति का घोड़ा छूटा ,
सैंट्रो पर मन उनका टूटा ।
ना ठाकुर ताजिया उठाते ,
ना हाजी रामायन गाते ।
साबिर - विक्रम हुए न्यारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।

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