Friday, 15 January 2016

हमारे अचूक हथियार - धर्म का धंधा और कड़ी निंदा।


पिछले दिनों आतंकी हमले फैशन में रहे।  और कोई घरेलू फैशन नहीं , ग्लोबल ! ग्लोबल ट्रेंड फॉलो  करना वैसे भी हमारे  लिए गर्व की बात है। तो  रशिया , फ्रांस और इजिप्ट के बाद पठानकोट और अब उडी बेस पर हुए आतंकी हमले ने हमको ऑफिशियली "terrorism survivor" राष्ट्रों की गौरवमयी लिस्ट में बनाये रखा।
क्या कहा , मुंबई ? अरे कब तक 93 और 2008 के ज़ख्म सहलाओगे।  कुछ तो लेटेस्ट और ट्रेंडी होना चाहिए कि नहीं। (कैसी विडम्बना है कि  आतंकी हमलों की त्रासदी को फैशन बोल रहा हूँ। बात बुरी लगती है, और है भी बुरी। लेकिन ज़रा सोचें उस भयानक निराशाजनक कुंठा के बारे में जो एक देशवासी से सैनिकों की मौत पर व्यंग्य लिखवाती है। )
 तो ग्लोबली फेमस तो हम हो गए एक बार फिर।  लेकिन इसका मुकाबला कैसे करें।  रूस सीरिया पर बम गिरा चुका।  फ्रांस ने २ दिन के अंदर रक्का का आतंकी ट्रेनिंग कैंप फोड़ दिया।  हम क्या करें ? facebook पर शहीदों  फोटो like और share कर दी।  सोशल मीडिया पर पॉलिटिशियन्स और पडोसी मुल्क को कोस लिया।  मन बड़ा बेचैन है, कुछ समझ नहीं आ रहा। ऐसे में हम अपने ठलुआ चाचा की राय लेते हैं। ठलुआ चाचा बहुत दूरदर्शी और विकट के प्रैक्टिकल प्राणी हैं। रिटायर हेडमास्टर हैं और हर मुद्दे में अपना दखल रखते हैं। यों 'पॉलिटिक्स' जहाँ - तहँ जमाते रहे हैं।  जब हम उनके पास पहुंचे तो वो अपने टीवी के आकर के लैपटॉप पर चित्रहार देख रहे थे इन्कोग्निटो विंडो पर।  हमको देखते ही झट से BBC की विंडो ओपन कर दी।  वो Alt +Tab  पर हमेशा कोई न्यूज़ ओपन रखते हैं . खैर हमने पूछा - "चाचा बहुत  हो गया।  अब हिन्दुस्तान को क्या करना चाहिए ? फ़्रांस की तरह जैश - ऐ - मोहम्मद के कैंप पर बम गिरा दें ? या सईद को लादेन के अंदाज़ में कर दें "एक्सेक्युट" ?"
"हाउ क्यूट " चाचा बोले और आँख मारी . फिर शुरू हो गए - लल्ला ये सब पश्चिम के चोंचले हैं।  हमको उनके जैसा करने की और उनसे सीखने की क्या ज़रूरत ?  भारत तो सदा से जगतगुरु रहा है , सो जानते ही हो। हमारे पास अपने हथियार हैं इन सब बातो से निपटने के लिए।  बम गिराना , हमला करना ये सब असभ्यता की निशानियाँ हैं।  आर्यवर्त तो सदा से विश्व की सभ्यतम संस्कृति है , सो तो तुम जानते ही हो।

" ऐसे कौन से  हथियार हैं चाचा ? " मेरी उत्सुकता बढ़ गयी थी। उसके बाद चाचा ने हमको एक गुप्त मीटिंग के   मिनट्स पेश किये जिसमें एक बड़े राष्ट्रनेता ने इस मुद्दे को डील करने पर प्रकाश डाला था , उसका सार नीचे दिया है। इस मीटिंग में पक्ष और विपक्ष के सभी नेता मौजूद थे।  ठलुआ चाचा ने उस मीटिंग में बतौर विशेषज्ञ शोभा  बढ़ाई थी। 
 " हमारे  पास नैतिकता का ऐसा हथियार है जिससे विश्व शांति पालक मारते ही कायम हो सकती है।  इसको ड्यूल  स्ट्रेटेजी से डील करना चाहिए। सबसे पहले यह समझो की आतंकवाद का प्रतिवाद हमारा प्रमुख उद्देश्य नहीं है , सरकार का मुख्य उद्देश्य होता है जनता को यह विश्वास दिलाना कि हम जनता की रक्षा और आतंकवाद से लड़ने हेतु प्रतिबद्ध हैं।  होना और बताना दो अलग अलग बातें हैं , इसको जितना जल्दी समझ लोगे उतना  सभी के लिए अच्छा होगा. जनता का ध्यान जितना मुद्दे से डाइवर्ट हो जायेगा , उतना ही सरकार और विपक्ष के लिए  शुभ रहेगा .  अब देश में हमारे जैसे काइयाँ राजनेताओं के अलावा २ तरह की जनता और है।  90 % कॉमन मैन ब्रीड और 10 % बुद्धिजीवी।"

सबसे पहले तो राष्ट्रवादी  विंग यह साबित कर दें की हमला करने  वाले मुसलमान थे। मुसलमान  और लिबरल नेता इसका प्रतिवाद करें।  "आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता " जैसे  रेडीमेड वक्तव्य दिए जाएँ।  उनके खण्डन के लिए  "हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना" आदि का सिद्धांत प्रतिपादित किया जाए। फिर "असहिष्णुता "और  "धर्म निरपेक्षता " की बातें हों।  छोटे मोटे दंगे आदि हो जाएँ तो बहुत ही उत्तम।  इससे 90 प्रतिशत कॉमन जनता बिजी हो जायेगी।  "व्यस्त जनता इज मस्त जनता।
इस प्रभाव को और गहरा करने के लिए हमारे राजनेता भाई तुरंत इस घटना की कड़ी निंदा कर दें।  कड़ी निंदा हर प्रहार का रामबाण हिन्दुस्तानी इलाज़ है। कुछ विषम परिस्थितियों में इसके उपयोग का तरीका नीचे दिया है।

१) आतंकवादी हमला - आतंकवाद की कड़ी निंदा।
२) युद्धविराम का उल्लंघन - उलंघन करने वाले देश की कड़ी निंदा।
३) हेट स्पीच - हेट स्पीच देने वाले नेता की कड़ी निंदा।
४) बढ़ती मंहगाई - सरकार मुनाफाखोरों की कड़ी निंदा करे और विपक्ष सरकार की।
५) भ्रष्टाचार - विपक्ष सरकार की कड़ी निंदा करे और सरकार विपक्षी दागियो की।
५) भाई भाई में अनबन - मोहल्ले वाले भाइयो की कड़ी  निंदा करें।
६) बढ़ते बलात्कार - बलात्कारियो और उनकी वकालत करने वालो की कड़ी निंदा की जाए।
७) अवैध प्रेम सम्बन्ध - अनैतिकता की कड़ी निंदा की जाए।
८ ) घर में चूहे छिपकली आदि हो जाना - चूहे और छिपकलियों की कड़ी निंदा की जाए।

नोट - ध्यान रहे , करना हमको कुछ नहीं है

मैं इस ज्ञान से अभिभूत हो उठा।  पर मेरे  पापी मन ने एक सवाल और पूछा - "पर चाचा , बची हुयी १०% जनता कैसे बिजी होगी ? "

चाचा उवाच - अरे कौन सी जनता ? १०% बुद्धिजीवी ? अरे वो तो वैसे ही बहुत बिजी है बुड़बक।  बुद्धिजीवी से हमको कोई खतरा नहीं है।  ये लोग निहायती शरीफ हैं।  इनका सारा गुस्सा भर्चुअल वर्ल्ड में ही निकलता है।  और अच्छा भी है।  सोशल मीडिया पर भी तो कुछ अपडेट होता रहना चाहिए न।

पर चाचा ऐसा करने से भविष्य में होने वाले आतंकी हमले ख़त्म हो जायेंगे ?

 "तुम्हारी यही समस्या है , तुम्हारे बेसिक्स ही क्लियर नहीं  हैं। जाओ , बहुत समय बर्बाद किया तुमने हमारा " फिर चाचा देश की हित चिंता में मग्न हो गए।

No comments:

Post a Comment