Thursday, 3 March 2016

कम्युनलिस्म का इंजेक्शन


 चारो तरफ 'opinions' की बाढ़ आई हुयी है।  "दलित विरोधी", "एंटी नेशनल" , "फ्रीडम ऑफ़ स्पीच" , पैट्रिऑटिस्म"जैसे नारे ट्रेंड में हैं। एक पोलिटिकल पार्टी देश विरोधी कार्यक्रम करने वाले लोगों को गोली मारने की बात करती है तो दूसरी पार्टियां ऐसे कार्यक्रमों को देश की डेमोक्रेसी के लिए ज़रूरी बताते हैं।  किसी मुद्दे पर आम राय बनने का नाम नहीं ले रही।  किसी को मुस्लिम होने की वजह से जज किये जाने का रोष है तो किसी को खुद को हिन्दू बोलने  पर एक विशेष  पार्टी का समर्थक मान लिया जाने का खौफ। इस हिन्दू मुस्लिम के झगडे में  ईसाई अब तक खामोश थे तो उनको उकसाने के लिए  सावरकर साहब की किताब आ  रही है जिसमें ईसामसीह को हिन्दू बताया है।   Why should Hindus & Muslims have all the fun ? तुम भी आओ न "                         दिमाग में बड़ा कन्फ्यूजन है। कुछ  "इंटेलेक्चुअल्स " चिल्लाते हैं , "इट हैज़ नथिंग तो डू विथ रिलिजन (यह धर्म के बारे में नहीं है) " . मैं मान नहीं पाता हूँ।  ये सब धर्म की वजह से ही तो है।  दो बहुत प्यारे शब्द चलन में आ गए हैं - "सेकुलरिज्म "और "कम्युनलिस्म ". कथित सेक्युलर और कम्युनल लोग एक दूसरे को इन उपाधियों से वक़्त बेवक़्त नवाज़ते रहते हैं।  
 इसकी जड़ें  कहाँ हैं ? कुछ कहते हैं कि धर्मगुरुओं ने भड़काया है जनता को।  मान लेते हैं।  लेकिन धर्मगुरु भी तो दुनिया में बिना किसी धर्म के लिए नफरत लिए आया था . कुछ कहेंगे राजनेता लोगों  भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं।  लेकिन इस्तेमाल होने के लिए भावनाएं पैदा होना भी तो ज़रूरी है।  कुछ कहेंगे की अशिक्षा इसका एक कारण है।  पर अशिक्षित आदमी को अपने धर्म से प्यार और दूसरे धर्म से नफरत की शिक्षा किसने दी ? इसका निर्णय
मैं एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ।  साझा परिवार था - माँ, बाप, दादी, परदादी, चाचा, बुआ वगैरह। स्कूल जाने से पहले का सारा ज्ञान माँ और दादी से मिला।  मुझे किसी ने हिन्दू धर्म का ज्ञान नहीं दिया।  धर्म के बारे में मेरी कुल जानकारी यह थी कि बहुत  और भगवान हैं , जो कुछ भी 'पाप' करने पर नाराज़ हो जाते हैं और सज़ा  देते हैं। बड़ों को 'नमस्ते ' न करना भी पाप था और छोटी बहन से झगड़ा करना भी। भगवान के डर ने मुझे शिष्टाचारी बना दिया। हनुमान , राम , रामायण और महाभारत की कहानियां मुझे याद थी।

 स्कूल के पहले दिन मिलने वाला आपका सबसे अच्छा दोस्त बनता है।  मुझे जीशान मिल गया, मेरी ही बेंच पर बैठा था ।  पीछे पियूष और जसबीर थे , दायें जैकब , नसीम और सत्या। बातें शुरू हुयी।  हनुमान मेरे हीरो थे , सो मैंने तुरंत उनकी कहानिया सुनानी  शुरू कर दी।  लेकिन यह क्या , बस पियूष और सत्य हनुमान को जानते थे , शायद जसबीर भी थोड़ा बहुत जानता होगा पर वो सर हिलाने के अलावा कुछ बोल नहीं पाया। उसके बाद जीशान , नसीम और जैकब ने अपने कहानियां सुनाई।  मेरे लिए वो एकदम नयी बातें थी,  हम सब हैरान थे. में सबसे एक साल बड़ा होने के नाते ज्यादा समझदार था, बिना बोले सोच सकता था ।  मुझे जो कुछ समझ  उसके हिसाब से पियूष और सत्या की मम्मी को कहानियां पता होंगी जबकि नसीम , जीशान और जैकब की मम्मी ने उनको झूठ बता दिया।  लेकिन झूठ बोलना तो पाप है।  इतने बड़े बड़े लोग भी पाप  करते हैं ?

जीशान मेरा  दोस्त था।  उसको सही बात बताना मेरा फ़र्ज़ था। सो मैंने उसको भगवानों और मंदिरों का कांसेप्ट समझाया।  बदले में उसने भी मुझे अल्लाह , पीर , फ़क़ीर का फलसफा बांचा।  हम दोनों हैरान थे।  मैंने यह बात माँ से पूछी।  तब माँ ने बहुत डिप्लोमेटिक तरीके से पूरी बात समझा दी ( उन्होंने पेरेंटिंग पर कोई किताब पढ़ रही होगी ) . मैं संतुष्ट था।  हम माँ को "मम्मी" कहते हैं , पापा अपनी माँ को "माताजी "और सामने वाले गुप्ता अंकल अपनी माँ को "अम्माँ " . ऐसे ही नसीम और जीशान भगवान को "अल्लाह "बोलते हैं, बस  इतनी सी बात ।  मैंने एक नयी चीज़ सीखी और कल यह बात जीशान को बताने को उतावला हो गया।

पर जीशान ने अगले दिन मुझसे बात नहीं की।  केवल पियूष और नसीम मेरे साथ बैठे थे।  जब नसीम बाहर गया तो पियूष ने मुझे बताया "नसीम मुस्लिम है, जीशान भी।  मम्मी ने कहा है उनसे बात मत करना। " एक दिन  में सबकी सोच बदल चुकी थी।  नसीम और सत्या की मम्मी  ने मेरी मम्मी जैसा ही  कुछ बताया था सो वो मेरे दोस्त थे। जीशान सिर्फ नसीम से बात करता था।  पियूष सिर्फ मुझसे और सत्या से मिलता था , जसबीर और जैकब से हाय हेलो कर भी लेता था पर नसीम और जीशान को देख कर मुह फेर लेता था। जीशान ने पियूष , सत्या और मुझसे बात करना बंद कर दिया था।  जसबीर और जैकब से सब बात करते थे , पर सिर्फ बात।  उनका कोई दोस्त नहीं था।  क्लास में एक अजीब सा माहौल बन गया था।  एक दिन नसीम ने मुझे बताया की ज़ीशान ने उसको "काफ़िर "से दोस्ती रखने को मना किया है।  उसका इशारा हमारी दोस्ती से था।  फिर एक दिन पियूष ने मुसलमानो के इतिहास से कोई घटना क्लास में चटखारे लेकर सुनाई।  इसपर जीशान ने हिन्दुओं को पत्थर पूजने वाला पत्थर दिमाग कहा। छोटी सी उम्र में सब समझदार  गए थे। पियूष और ज़ीशान की एक दिन इस बात पर  भी बहस हुई कि अल्लाह और भगवान की फाइट करवाई जाए तो कौन जीतेगा।  अभिभावकों ने हमको "कम्युनल" या "सेक्युलर " बना दिया था।  पियूष और जीशान के दिमाग से वो फितूर कभी नहीं निकल पाया।  उनकी फेसबुक पोस्ट अभी भी उनकी मानसिकता बताते हैं।  दोनों औसत छात्र रहे।  ना अच्छा पढ़े न अच्छी नौकरी मिली। खाली टाइम और सस्ते इंटरनेट ने इनकी "धर्म सेवा " को और हवा दी।

बच्चों की मानसिकता अभिभावक बनाते हैं।  एंटीबायोटिक , हेपटाइटिस बी , पोलियो , जॉन्डिस वगैरह का इंजेक्शन लगवाते लगवाते हम बच्चो को कम्मुनलिस्म का इंजेक्शन भी कब लगा देते हैं , पता ही नहीं चलता। बच्चों को बड़ों की इज़्ज़त करना , मिल बांटकर खाना , मार पीट न करना , गाली न देना , toilet जाने के लिए इशारा करना , "नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ " गाना , गिनती पहाड़े और कविता पढ़ना सिखाने वाले माँ बाप मज़हब की आधारभूत शिक्षा देना न जाने कब सीखेंगे।

Friday, 15 January 2016

हमारे अचूक हथियार - धर्म का धंधा और कड़ी निंदा।


पिछले दिनों आतंकी हमले फैशन में रहे।  और कोई घरेलू फैशन नहीं , ग्लोबल ! ग्लोबल ट्रेंड फॉलो  करना वैसे भी हमारे  लिए गर्व की बात है। तो  रशिया , फ्रांस और इजिप्ट के बाद पठानकोट और अब उडी बेस पर हुए आतंकी हमले ने हमको ऑफिशियली "terrorism survivor" राष्ट्रों की गौरवमयी लिस्ट में बनाये रखा।
क्या कहा , मुंबई ? अरे कब तक 93 और 2008 के ज़ख्म सहलाओगे।  कुछ तो लेटेस्ट और ट्रेंडी होना चाहिए कि नहीं। (कैसी विडम्बना है कि  आतंकी हमलों की त्रासदी को फैशन बोल रहा हूँ। बात बुरी लगती है, और है भी बुरी। लेकिन ज़रा सोचें उस भयानक निराशाजनक कुंठा के बारे में जो एक देशवासी से सैनिकों की मौत पर व्यंग्य लिखवाती है। )
 तो ग्लोबली फेमस तो हम हो गए एक बार फिर।  लेकिन इसका मुकाबला कैसे करें।  रूस सीरिया पर बम गिरा चुका।  फ्रांस ने २ दिन के अंदर रक्का का आतंकी ट्रेनिंग कैंप फोड़ दिया।  हम क्या करें ? facebook पर शहीदों  फोटो like और share कर दी।  सोशल मीडिया पर पॉलिटिशियन्स और पडोसी मुल्क को कोस लिया।  मन बड़ा बेचैन है, कुछ समझ नहीं आ रहा। ऐसे में हम अपने ठलुआ चाचा की राय लेते हैं। ठलुआ चाचा बहुत दूरदर्शी और विकट के प्रैक्टिकल प्राणी हैं। रिटायर हेडमास्टर हैं और हर मुद्दे में अपना दखल रखते हैं। यों 'पॉलिटिक्स' जहाँ - तहँ जमाते रहे हैं।  जब हम उनके पास पहुंचे तो वो अपने टीवी के आकर के लैपटॉप पर चित्रहार देख रहे थे इन्कोग्निटो विंडो पर।  हमको देखते ही झट से BBC की विंडो ओपन कर दी।  वो Alt +Tab  पर हमेशा कोई न्यूज़ ओपन रखते हैं . खैर हमने पूछा - "चाचा बहुत  हो गया।  अब हिन्दुस्तान को क्या करना चाहिए ? फ़्रांस की तरह जैश - ऐ - मोहम्मद के कैंप पर बम गिरा दें ? या सईद को लादेन के अंदाज़ में कर दें "एक्सेक्युट" ?"
"हाउ क्यूट " चाचा बोले और आँख मारी . फिर शुरू हो गए - लल्ला ये सब पश्चिम के चोंचले हैं।  हमको उनके जैसा करने की और उनसे सीखने की क्या ज़रूरत ?  भारत तो सदा से जगतगुरु रहा है , सो जानते ही हो। हमारे पास अपने हथियार हैं इन सब बातो से निपटने के लिए।  बम गिराना , हमला करना ये सब असभ्यता की निशानियाँ हैं।  आर्यवर्त तो सदा से विश्व की सभ्यतम संस्कृति है , सो तो तुम जानते ही हो।

" ऐसे कौन से  हथियार हैं चाचा ? " मेरी उत्सुकता बढ़ गयी थी। उसके बाद चाचा ने हमको एक गुप्त मीटिंग के   मिनट्स पेश किये जिसमें एक बड़े राष्ट्रनेता ने इस मुद्दे को डील करने पर प्रकाश डाला था , उसका सार नीचे दिया है। इस मीटिंग में पक्ष और विपक्ष के सभी नेता मौजूद थे।  ठलुआ चाचा ने उस मीटिंग में बतौर विशेषज्ञ शोभा  बढ़ाई थी। 
 " हमारे  पास नैतिकता का ऐसा हथियार है जिससे विश्व शांति पालक मारते ही कायम हो सकती है।  इसको ड्यूल  स्ट्रेटेजी से डील करना चाहिए। सबसे पहले यह समझो की आतंकवाद का प्रतिवाद हमारा प्रमुख उद्देश्य नहीं है , सरकार का मुख्य उद्देश्य होता है जनता को यह विश्वास दिलाना कि हम जनता की रक्षा और आतंकवाद से लड़ने हेतु प्रतिबद्ध हैं।  होना और बताना दो अलग अलग बातें हैं , इसको जितना जल्दी समझ लोगे उतना  सभी के लिए अच्छा होगा. जनता का ध्यान जितना मुद्दे से डाइवर्ट हो जायेगा , उतना ही सरकार और विपक्ष के लिए  शुभ रहेगा .  अब देश में हमारे जैसे काइयाँ राजनेताओं के अलावा २ तरह की जनता और है।  90 % कॉमन मैन ब्रीड और 10 % बुद्धिजीवी।"

सबसे पहले तो राष्ट्रवादी  विंग यह साबित कर दें की हमला करने  वाले मुसलमान थे। मुसलमान  और लिबरल नेता इसका प्रतिवाद करें।  "आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता " जैसे  रेडीमेड वक्तव्य दिए जाएँ।  उनके खण्डन के लिए  "हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना" आदि का सिद्धांत प्रतिपादित किया जाए। फिर "असहिष्णुता "और  "धर्म निरपेक्षता " की बातें हों।  छोटे मोटे दंगे आदि हो जाएँ तो बहुत ही उत्तम।  इससे 90 प्रतिशत कॉमन जनता बिजी हो जायेगी।  "व्यस्त जनता इज मस्त जनता।
इस प्रभाव को और गहरा करने के लिए हमारे राजनेता भाई तुरंत इस घटना की कड़ी निंदा कर दें।  कड़ी निंदा हर प्रहार का रामबाण हिन्दुस्तानी इलाज़ है। कुछ विषम परिस्थितियों में इसके उपयोग का तरीका नीचे दिया है।

१) आतंकवादी हमला - आतंकवाद की कड़ी निंदा।
२) युद्धविराम का उल्लंघन - उलंघन करने वाले देश की कड़ी निंदा।
३) हेट स्पीच - हेट स्पीच देने वाले नेता की कड़ी निंदा।
४) बढ़ती मंहगाई - सरकार मुनाफाखोरों की कड़ी निंदा करे और विपक्ष सरकार की।
५) भ्रष्टाचार - विपक्ष सरकार की कड़ी निंदा करे और सरकार विपक्षी दागियो की।
५) भाई भाई में अनबन - मोहल्ले वाले भाइयो की कड़ी  निंदा करें।
६) बढ़ते बलात्कार - बलात्कारियो और उनकी वकालत करने वालो की कड़ी निंदा की जाए।
७) अवैध प्रेम सम्बन्ध - अनैतिकता की कड़ी निंदा की जाए।
८ ) घर में चूहे छिपकली आदि हो जाना - चूहे और छिपकलियों की कड़ी निंदा की जाए।

नोट - ध्यान रहे , करना हमको कुछ नहीं है

मैं इस ज्ञान से अभिभूत हो उठा।  पर मेरे  पापी मन ने एक सवाल और पूछा - "पर चाचा , बची हुयी १०% जनता कैसे बिजी होगी ? "

चाचा उवाच - अरे कौन सी जनता ? १०% बुद्धिजीवी ? अरे वो तो वैसे ही बहुत बिजी है बुड़बक।  बुद्धिजीवी से हमको कोई खतरा नहीं है।  ये लोग निहायती शरीफ हैं।  इनका सारा गुस्सा भर्चुअल वर्ल्ड में ही निकलता है।  और अच्छा भी है।  सोशल मीडिया पर भी तो कुछ अपडेट होता रहना चाहिए न।

पर चाचा ऐसा करने से भविष्य में होने वाले आतंकी हमले ख़त्म हो जायेंगे ?

 "तुम्हारी यही समस्या है , तुम्हारे बेसिक्स ही क्लियर नहीं  हैं। जाओ , बहुत समय बर्बाद किया तुमने हमारा " फिर चाचा देश की हित चिंता में मग्न हो गए।

Saturday, 17 January 2015

तुझे कौन वोट देगा ?

हर कोई यहाँ बिजनेस वाला है , व्यापारी है।
अगर नहीं भी है तो बनने की इच्छा भारी है।
नियम हैं बड़े तंग , करने पड़ते हैं भंग।
प्रॉफिट ज्यादा  होता है , कम  दिखाना पड़ता है।
फ्री मैं कुछ नहीं होता,  खाना - खिलाना पड़ता है।
पक्के कागज़ के बिना तू काम होने नहीं देगा !
कौन तुझे वोट देगा ?


प्राइवेट हो या सरकारी , गरीब है बेचारा कर्मचारी।
उसपर खर्चे भारी , टैक्स चुराना है लाचारी।
हम सारे फर्जी इन्वेस्टमेंट दिखाते हैं।
अपने ही घर की रेंट रिसीप्ट IT रिटर्न में लगाते हैं।
सौ रूपए डोनेट करके लाख की रसीद बनवाते  हैं.
जैसे तैसे इधर उधर से अपना काम चलाते हैं।
टैक्स तू पूरा लेगा !! कौन तुझे वोट देगा ??


भारत में रोज़ कोई पर्व है , ड्रिंक & ड्राइव हमारा गर्व है।
असली प्रमाण पत्र यहाँ मुश्किल से बन पाते हैं ,
जाली सर्टिफिकेट से बहुतेरे नौकरी पाते हैं।
अब रात में तेज़ गाडी से लोग मर ही जाते हैं।
करते नहीं हैं , पर गलती से रेप हो जाते हैं।
तू ज़रा सी गलती पर बड़ी बड़ी सज़ा देगा  !!!
कौन तुझे वोट देगा ???

Friday, 2 January 2015

Story of an Internal Migrant




Thursday, 2 pm
Vikram took a deep breath. "It's not going to work this way" he thought. "I must get a valid license to drive in Delhi" He recalled his days in his hometown in UP where 50 & 100 rupee notes were the driving licenses for bike & car respectively. He wished the things were same in Delhi.
Vikram is Manager in Delhi who belongs to a small town in UP. He has been in Delhi for past 10 years and has changed the same no of accommodations in this time, crazy bachelor life! Finally he is going to buy a small car, and of course he needs a ‘Valid’ driving license for that. He already holds a license which allows him to drive from a bike to a 20 wheel truck but it’s not a valid one – his date of birth on the document shows him 1 year older than he is and that’s the trouble. He has tried incalculable tricks to get a Delhi license but they didn’t work. “A resident of UP can’t get a DL in Delhi and they talk about One India - United India, what a farce” he mumbled, as he walked towards Boss’s cabin to ask for a Monday leave. He needs to give a valid & genuine reason to take one “casual” leave from his Quota of 20. Sucks!
Saturday, 7 pm
Vikram is hammering on the keyboard in an attempt to finish the reports fast. He needs to reach ISBT by 9 to get the bus to Bareilly. From there he’ll take another bus to reach his hometown. Usually you will get a bus to Bareilly every 15 minutes, but Vikram can’t just take any Bus. He is an internal migrant, a small town guy settled in capital. He has booked a Volvo and called a cab to drop him to ISBT. “It’s not a matter of luxury but need” he always told his Maa every time she yelled at him for such expenses. “My work is tiring enough, It’s not about giving 2 lectures in college and you’re done for the day” He said as he banged the phone. He never hesitated to reel in his professor father’s comfortable life to explicate the formidable picture of his lifestyle.
His phone blinked. Cab has arrived. He must leave now. He starts to wrap up facilely as he doesn’t want the cab to charge for waiting.
Sunday , 5 am
Vikram has just reached his hometown. His father owns a home in this town but no one stays there except a couple of tenants. He has the Keys but he is tired enough to open the floor and fix up the home for stay , a house which is locked for over a year.
He ponders over the other options as he puffs a local cigarette. These silly paanwalas of his town don’t have his brand. “Maa has always insisted to visit his Mamaji who puts up in the same town. He’ll be happy to see me. I can enjoy home cooked food and free stay as long as I wish.” He had almost made his mind and called a rickshaw and hopped into it. It was when he recalled his cousin’s marriage last year. This Mamaji had boiled his blood as he kept asking about his marriage plans.
“Screw it ! ” he said to himself , sweet box is for 400 , and a room in the best hotel here must not go above 500. “Bhaiyaa , kisi achchhe Hotel le chalo” He barked. It was his birthplace. He owned a property here. He knew the 50% population of the town and there were more than a dozen places he could stay at. But he preferred to spend his time in a lonely room and not to meet any old buddy , teacher , relative or neighbor . He was startled at his own behavior.
Monday , 11 am
“Good morning Mahesh Ji” Vikram uttered as he approached the local RTO office.
Mahesh ji is nothing yet everything in this office. He is an independent agent and running his business here for over 20 years. He is an integral part of office. RTO employees regard his orders more than those from their bosses. Vikram had got his DL done from Mahesh ji when he was yet 17, it’s just that Delhi Traffic Police call it invalid.
Office has many other integral parts though never mentioned in the papers. A banana tree encircled by sacred threads , Shamsher singh – a giant black dog (no one knows who gave him this secular name) , drawing made on walls by pan and gutkha – an unique color for every type & brand , a herd of cattle roaming free in the premises, chewing the cud & making love. Mahesh ji holds a different importance. Visitors can’t ignore him like poor animals & objects.
Mahesh ji didn’t respond. He was busy with some other work. Vikram stood aside and waited. Maheshji was taking test of an applicant. He takes test of all the applicants before the form is processed. one can skip these tests by paying a small fee which he calls Suvidha shulk – Convenience fee. Suvidha shulk is completely Justified. If one considers it bribe, most certainly it’s their mistake. Colleges take donations and admit the students who couldn’t qualify the entrance, you can always pay extra to temple and get into the VIP queue, you get your train & air tickets on a short notice by paying little extra.
This fellow didn’t understand Mahesh Ji’s hint for Suvidha Shulk . So Maheshji asked him to come after a couple of days.
“Its written there on the website that I can get it done in 2 hours” argued the fellow.
Maheshji threw a clever smile “Babuji is in hurry, let me do his work first” he stood up and pointed towards a red wagon R parked in the compound “drive it out and park it again at the same place” The man hesitated. He had never touched the steering wheel in his life however , he moved towards the vehicle with heavy steps. Mahesh ji got his nerve; he was crocodile of this ocean. “Leave the room gentlemen, he is a pilot” he yelled with sarcasm, making the path clear for him. The guy was ashamed enough to turn the ignition on. He came out grinning with embarrassment – “who asks you to give a demo for learning license? It’s required when you come to renew the license. It’s written there on the website that….” He went on but Mahesh ji had got busy with others. He doesn’t have time for petty things, he is an important person.

Vikram moved forward and told him his business. He’ll get it done. The learning document will reach at his address in 4 working days and a month later he would need to come and get it renewed. Vikram got the hint, “Kharcha bolo” he uttered the two most important words. Mahesh ji glanced at him and learned that he was an ‘internal migrant’. He liked these chaps. They are so professional. He calculated his upcoming expenses in his mind before he told him that it would take 2500 for both learning & pukka license. “ask someone to get the tea” Vikram said as he threw a 1000 Rs note on table. “I ‘ll give you the balance when I come for permanent DL. And yes, I want the photocopy of the document today if not original. I don’t have time to run 100 times for a paper.” People out there, including a police constable, were amazed. Mahesh looked at him, feeling defeated. He didn’t have guts to return the money or yell at Vikram for his audacity. Vikram felt better, he looked at the guy who couldn’t drive. Poor man was still there, he just hoped that the guy understood how to get things done here.
                                                What happened later until Vikram got the document is not worth writing. Summarily, he kept sipping tea and puffing cigarettes while Mahesh did all the running. He had to move his ass once to get his photo clicked. “Here you go” Mahesh said as he handed him the photo copy of the driving license. Vikram checked the time. “75 minutes! I must say you guys are some thing. Bhai sahib told me that as per website, it’ll take 2 hours to process. 45 minutes to deadline and I already hold the DL” he said as he winked at the poor man & guffawed. Mahesh shared the laughter with him. He didn’t get the sarcasm, but the poor man did. He walked up to the Mahesh & asked – “What is the total Kharcha?”


Friday, 18 July 2014

Take me in to write some classy “bullshit”



 Hi ,
Whoever you are, you are close to awesome. I saw your invitation for internship on your website so I think I should join you guys and spoil you more.
I work with a search engine (name not disclosed to avoid publicity of company, I am their employee not brand ambassador), in fact I don’t work much but I pretend to work all the time. To look busy, I must be glued to my system. That’s how I start reading bullshit on internet from your site and some other better sites like Faking news , the unreal times etc. LOL ! don’t be disheartened , you guys are good too. Anyway, all I wanted to say that after reading bullshit for over 4 hours a day for more than 3 years now, I have also become a fond bullshitter, who this society can’t tolerate for long.
I discovered that I have been spoiled by you and other similar monsters when I started trolling everyone. Everyone means everyone - from my parents to my relatives, my friends, my colleagues and even my bosses. My most nagging habit is comparing people with celebrities for their awfulness which they even don’t understand many times (Obviously, they haven’t read this amount of bullshit in their complete life which is my daily dose). Some I compare with Shashi Tharoor & Manish tewari for their “Angrezi”, others I keep in category of Ashutosh & Shahid Kapoor for the same. I am not getting a girlfriend because of side effects I got from these crap sites, though I have numerous female admirers around, thanks to the similar crap content that I keep reading and reciting. Everyone keeps saying that there is something wrong with me (that’s what is your prime requirement, isn’t it ?)
Conclusively, bullshitters like you and some other similar guys (who proudly call them cool and unconventional) have contributed a lot to spoil me to the core and turn me into one like you. Therefore, it becomes your social responsibility to adopt me and take care of me.
Thanks,
Mayank (9990****48)
PS ; I am not attaching my CV in application. That’s a “professional” document which contains my achievements as an efficient worker and hence is useless for you. I am an Engineering diploma holder plus an English graduate who is torturing (and being tortured in) a reputed 12000 crore Rs advertising company as an Asst Manager – Quality. Rest all we can discuss over a drink ;)



Monday, 13 January 2014

बदले आखिर गाँव हमारे !


पिछले दिनों लगभग 8 वर्ष बाद अपने पैतृक गाँव जाना हुआ । वहां हुए परिवर्तन व विकास (अथवा ह्रास) ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया । अब ये वो पुराने गाँव नहीं रहे , बदल गए हैं ।

नहीं झोपड़ी नहीं तबेला,
न कोई बच्चा गन्दा मैला ।
नहीं बाग़ नहीं वो अमराई ,
न ही बैल न ही गाय पछायीं ।
नहीं ताश नहीं वो ठलुआई ,
नहीं हँसी ठट्ठा वो भाई ।
ना वो कच्चे आँगन द्वारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।




ना वो लाल रिबन की चोटी ,
भारी कुनबा साझी रोटी ।
न अब कहीं पंचायत होती ,
ना आँगन में कुतिया सोती
ताऊ नहीं दातौन चबाते ,
ना चाचाजी डंड लगाते ।
सब रोजी रोटी के मारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।



चूल्हे देते नहीं दिखाई ,
कहाँ दही,कहाँ दूध मलाई !
सभापति का घोड़ा छूटा ,
सैंट्रो पर मन उनका टूटा ।
ना ठाकुर ताजिया उठाते ,
ना हाजी रामायन गाते ।
साबिर - विक्रम हुए न्यारे ,
बदले आखिर गाँव हमारे ।

Letter to Arvind Kejriwal - Kamal Farooqui Is An Honest Test Of The Road You Will Take To Bring About The Change

Dear Arvind ,
Ex-Samajwadi Party leader Farooqui meets Arvind Kejriwal, says 'everybody is interested in joining AAP'
Read more at: http://indiatoday.intoday.in/story/kamal-farooqui-samajwadi-party-join-aap-arvind-kejriwal-sanjay-singh/1/333479.html
This news extensively shocks me and other many admirers of AAP. Yes I know you ve not given green signal to him yet. Yes I know that and believe that you are a bunch of intelligent and perspicacious people. Yes I know that we should not doubt your intention. Most Importantly I know that  if I can discriminate between right and wrong , you must have planned far brilliant things. Therefore , this news should not be shocking for me, for I must know that you would think 1000 times before taking any such decision.
But it shocks me. Farooqui’s meeting with you does not shock me, media’s speculations don’t shock me (I never cared about their exit polls even) , neither do the statements  of other parties on this meeting. What shocks me is , the statement of Farooqui post meeting.
 On being asked whether he was going to join AAP, Farooqui said that he "would let you know (reporters) tomorrow".
Read it carefully Arvind. What does it mean ? What message does it convey ? What does it hint to your admirers , people who took interest in politics for the first time in their entire lives? Let me tell you what do I understand by this statement (quite possible Farooqui’s intent was just to convey this false message to people like me in order to break our trust in you). This statement makes one understand that You have offered Farooqui to join AAP and he demanded one day time to think over it. Isn’t it ridiculous ? I believe that you ve not made any such offer. I trust in you and your intellect and your principles .
All I mean to say that you must not take this man just because he’ll bring in some Muslim votes. Its irony of our country that instead of working for Muslims , our leaders use them. Be it Congress, SP or BJP. Everyone has same theory . Add a big leader with you and a huge community of minority would cast their vote in your name. Please do not fall in the same line Arvind , I believe you shall not. This man doesn’t deserve to stand with you. Sins he has done are too abhorrent to forgive.[to name one - Farooqui, who was sacked by SP as its secretary in September following his controversial comment that Indian Mujahideen co-founder Yasin Bhatkal was arrested because of being a Muslim, said here that he would announce his decision on joining AAP on Monday.]
 Also , AAP is not holy Gangey where even the most nefarious souls can get rid of their sins and get Moksha .
You are wise enough to understand feelings of your admirers. We are the people who never bothered about the elections and politics. We are the one who used to eat drink and be merry in our lives until you made us realize our power as well as our responsibilities.

DON'T DISAPPOINT US , DON'T DISAPPOINT THE NATION !!!
Jai Hind
Sincerely,
An Aam Aadmi