Monday, 2 July 2018

यह खबर पढ़ लीजिए।  यह अंधानुकरण के भयावह निष्कर्ष का एक छोटा सा उदाहरण है।  "छोटा सा " इसलिए क्योंकि इतिहास इससे कई गुणा अधिक बर्बरता से भरा हुआ है , और किसी भी धर्म का इस बर्बरता में ज़रा भी कम योगदान नहीं है।  कम से कम बर्बरता के मामले में - "सभी धर्म बराबर हैं " 
       
   परेशानी की बात यह है की अपने धर्म में कोई कमी दिखाई नहीं देती किसी को।  ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इन 11 लोगों को मूर्ख और अपने धर्म को निर्दोष ठहराने में देर नहीं लगाएंगे। कुछ ही दिन पहले राजस्थान में अल्लाह की ख़ुशी के लिए एक धर्मांध ने अपनी मासूम बेटी को हलाल कर दिया था।  उसपर भी सबने उसको मूर्ख और जाहिल ठहराते हुए अपने मज़हब को इसकी ज़िम्मेदारी से बचा लिया था। 

असल में इन दोनों ही घटनाओं के लिए सिर्फ और सिर्फ  धर्मान्धता ही ज़िम्मेदार है और कोई नहीं।  ज़रा सोचिए इस परिवार की मनोस्थिति  ! विज्ञान और तकनीक के इस युग में कितनी दृढ इच्छाशक्ति के साथ वो अपनी धर्मान्धता पर विश्वास कायम रख पाए होंगे।  उन 15 -16  साल के लड़कों ने ज़रूर अपने स्कूल में ये बातें की होंगी और सोचिये उनके सहपाठी दोस्त कैसे उनका मज़ाक उड़ाते होंगे , पर उनके  धर्मांध मन ने उनको कहा होगा की "ये सब मूर्ख अनंतकाल तक कष्ट भोगेंगे जबकि हम जल्दी ही जीवन मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेंगे। " और शायद इसीलिए उन्होंने अपने घरवालों का विरोध न किया  अपितु ख़ुशी ख़ुशी आत्महत्या को स्वीकार किया।  और आप कहते हैं कि धर्म निर्दोष है। सोचकर देखिए।

तर्क कीजिए। हर धार्मिक शब्द पर सवाल कीजिए।  तर्क की धर्म पर विजय ही मनुष्यता की पाशविकता पर विजय है।


Saturday, 3 March 2018

आज आधुनिक हिंदी साहित्य के श्रेष्ठतम कहानीकारों में से एक स्व. श्री फणीश्वर नाथ 'रेणु' का जन्मदिवस है।  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे समकालीन रचनाकार श्री रेणु का लेखन मुंशी प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाता है और इसीलिए उन्हें "आजादी के बाद का प्रेमचंद" की संज्ञा भी दी जाती है।  रेणु के प्रथम उपन्यास "मैला आँचल" के लिए इन्हें बहुत ख्याति मिली जिसके लिए उनको 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया गया । यदि अभी तक आप श्री रेणु के साहित्य से अछूते रहे हैं तो आज उनके जन्मदिवस पर उनकी श्रेष्ठ आंचलिक कथा "पंचलाइट" अवश्य पढ़ें।

माँ भारती के  प्रिय पुत्र को उनकी वर्षगांठ पर नमन !

Wednesday, 28 February 2018

बुरा न मानो होली है !


 लो फिर से होली आती है , सब स्वागत को तैयार रहें
रंग के संग भांग और कीचड़ , और शराब की भरमार रहे।
फिर कर गुजरें उत्पात कोई , होली के बहाने इक - आधा,
त्यौहार से हमको क्या मतलब , क्या जानें उसकी मर्यादा।
ये संयम - नियम न मानेंगे , हम तो हैं मस्तों की टोली
हुड़दंग सहो और चुप बैठो, भाई बुरा न मानो , है होली।

 ऑफिस जाती महिलाओं को गुब्बारा मार दिया , तो क्या ?
और सोते हुए भिखारी का कीचड़ से उद्धार किया , तो क्या ?
हम टंकी में रंग घोलेंगे , हर घर में वही रंग जाएगा,
पानी की बर्बादी पे तुम्हारा , भाषण काम न आएगा।
कॉलोनी की महिलाओं से, हरकत अश्लील ज़रा कर ली।
तो इतना क्यों चिल्लाते हो ? भाई बुरा न मानो , है होली।

होली निरपेक्ष धर्म से है , हम सबके संग मनाएंगे।
और  'उनके'  मोहल्लों  में जाकर, फिर लाल-हरा नहलाएंगे
फिर भी वो अगर नहीं भड़के , तो विजय ध्वजा लहरायेंगे
"ज़िंदा - मुर्दा" के  नारों से फिर आसमान गुंजायेंगे।
फिर थोड़ा दंगा हो जाए , चल भी जाए कुछ बम - गोली
दो चार तो मरते रहते हैं , भाई बुरा न मानो , है होली।

Sunday, 25 February 2018


हमारा समाज भी ना , दिग्भ्रमित हो चुका है।

हज़ारो करोड़ के लोन से उद्योग लगाए हैं
क्या हुआ गर बैंक के पैसे नहीं लौटाए हैं  ?
पर ये बैंक उद्योगपति से क्यों वापस मांगते  है ?
क्या बड़े लोगों से उसके रिश्ते को नहीं जानते  है ?
बैंक पहले ये देखे कि किसान ने 50 हज़ार नहीं लौटाए हैं
और इस बार 2  प्रतिशत लोग कार लोन की किश्त नहीं भर पाए हैं
उद्योगपति बेचारा तो देश तक छोड़ चुका है
हमारा समाज भी ना , दिग्भ्रमित हो चुका है।





Tuesday, 30 January 2018

ईर्ष्यालु



नैनीताल विहार का बना कार्यक्रम नेक ,
पिकनिक पर बारह युवक साथ में कन्या एक .
लड़की को इम्प्रेस करने को क्या-क्या करतब दिखलाते हैं ,
खाई में कभी उतरते हैं , पेड़ पर कभी चढ़ जाते हैं .

Mr. A चेन स्मोकर हैं , सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे ,
भाई B को ये पसंद नहीं कैंसर के कारण बता रहे .
ये कहते फिजूलखर्ची है , वो कहते हैं स्टाइल है ,
दोनों का परम अभीष्ट एक , जो कन्या की smile है .
Mr C बॉडी बिल्डर हैं , बोले सेहत ही खज़ाना है .
दुबलेभाई कहते हैं , अब स्लिम बॉडी का ज़माना है .

ऐसे ही वे पर दोषों पर निज गुण को श्रेष्ठ बताते हैं ,
लड़की जिसको लाइन दे दे , सब उसके विरुद्ध हो जाते हैं .
चलते - चलते सबने देखा एक व्यक्ति बन्दर पकड़ रहा ,
बन्दर कुछ कर पाते हैं ऐसे फंदे में जकड़ रहा .
फंदे से मुक्त पुनः करके प्राणी को ड्रम में डाल रहा .
ड्रम पर कोई ढक्कन देख सबने ही उसको मूर्ख कहा .

इक सज्जन बोला बेवकूफ ! कुछ तेरे हाथ आएगा ,
ये jumping expert होता है पल में बाहर जायेगा .
वह सादर बोला खुद देखें पंद्रह को पकड़ चूका हूँ मैं.
एक भी नहीं बाहर आया नहीं यूँ ही अकड़ रहा हूँ मैं.

आश्चर्यचकित से होकर के सबने इसका कारण पूछा.
वह बोला असली मूर्ख तुम्हीं जो इतना तुमको सूझा.
यह सच है कोई भी बन्दर यह सुगम कार्य कर सकता है.
पर हम इंसानों के जैसा यह भी ईर्ष्यालु होता है.

जब कुछ बन्दर प्रयत्न करके ड्रम के मुंह तक पते हैं,
तब उनके ईर्ष्यालु भाई उन्हें खींच के नीचे लाते हैं.
जो मानव अवगुण होते हैं वह इन सबके भी अन्दर हैं
हम कहने को ही मनुष्य हैं वस्तुतः हम सभी बन्दर हैं.